गांधी और खादी अब कुर्सी पाने का जरिया बन गए हैं। सत्ता की खादी , खादी से गद्दी

सत्ता की खादी , खादी से गद्दी , गांधी की खादी से खुरशी - गद्दी अपनी छवि सुधारने के लिए भाजपा का अभियान, अब गांधीजी का इस्तेमाल सिर्फ सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है। खादी का इस्तेमाल गद्दी पाने के लिया किया जाता है। खादी फैशन शो होते हैं। खादी की बिकिनी बनाकर नेता सत्ता हासिल कर सकते हैं।

गांधी और खादी अब कुर्सी पाने का जरिया बन गए हैं। सत्ता की खादी , खादी से गद्दी

BY- DILIP PATEL 

सत्ता की खादी , खादी से गद्दी

गांधी की खादी से खुरशी - गद्दी

अपनी छवि सुधारने के लिए भाजपा का अभियान, अब गांधीजी का इस्तेमाल सिर्फ सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है। खादी का इस्तेमाल गद्दी पाने के लिया किया जाता है। अमित शाह, साबरमती आश्रम के नीचे साबरमती रिवरफ्रंट आये थे। ईन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए और चले गए। वह गांधीजी, खादी और गुजराती भाषा की बात करते रहे, शिक्षा और गांधीवादी विचारों की बात करते रहे। सादगी के प्रतिक ह्रदयकुंज के सामने भव्य पाथ वे बनाया। कभी यहा से दांडी कूच नीकली थी। अब यहां चलने के किये करोडो के पूल बन रहे है। खादी कभी अर्थ व्यवस्था अच्छी करने के लिये थी, अब खुरशी पाने के लिये खादी है। संघ हमेशा गांधीजी के खिलाफ रहा है। लेकिन संघ के प्रचारक अब सत्ता हासिल करने के लिए गांधीजी की खादी का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सत्ता  गांधीनगर और दिल्ली की भी हो सकती है।

गांधी के बारे में बात करने से गांधीवादी नहीं हो जाते।

साबरमती आश्रम को तोड़कर और मूल पहचान को तोडकर पुनर्निर्माण के नाम पर इसका भगवाकरण करके गांधीजी के सिद्धांतों को हासिल नहीं किया जा सकता है। अमित शाह ने वाल पेंटिंग साबरमती रीवरफ्रंट पर रखी थी। एक कहावत है मुख में राम बगलामे छूरी, लेकिन मुंह में गांधी और बगल में गोडशे जैसी स्थिति है।

एक सच्चे गांधीवादी पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे। साबरमती आश्रम के बगल में गुजरात के सपूत पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की समाधि पर बीजेपी नेता नहीं जाते हैं। अब गांधीजी का इस्तेमाल सिर्फ सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है। गुजरात के 70 प्रतिशत खादी बुनाई प्रतिष्ठान सुरेंद्रनगर जिले में ही थे। न तो भाजपा की गुजरात सरकार और न ही केंद्र सरकार ने तब तक कुछ किया जब तक यह खत्म नहीं हो गया। गुजरात सरकार ने 34 संस्थानों को रु. 2.48 करोड़ के 1.50 लाख मीटर खादी कपड़े का ठेका दिया गया था। शिक्षा विभाग और खादी बोर्ड ने 16 अगस्त 2018 को काम शुरू किया और 15 दिनों के भीतर सरकार द्वारा सभी कपड़े बुने गए।

 मोदी की खादी नीति

1997-98 में सुरेंद्रनगर जिले के खादी का कुल कारोबार 49 करोड़ रूपिये का था। रोजाना 53 हजार लोग को रोजी मिल रही थे। मोदी के 10 साल के शासन में 2010 में टर्नओवर 26 करोड़ रुपए था। 12 हजार लोगों को ही रोजी-रोटी मिली। अब सबकुछ खत्म हो गया ।

खादी खी रोटी

1908 में हिंद स्वराज पुस्तक में गांधीजी ने लिखा और माना कि भारत की गरीबी को मिटाया जा सकता है और स्वतंत्रता केवल खादी के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। 4 हजार कारीगर असली खादी बुनते थे। खादी अब बुनी नहीं जाती। गुजरात में 171 खादी प्रतिष्ठानों में से केवल 20 से 30 खादी प्रतिष्ठान ही वास्तव में खादी का कपड़ा बनाते हैं। उन्हें न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। आज के नेता विदेशी कपड़े पहनकर गांधी की खादी की बात करते हैं। 10 हजार करोड़ रुपये हवाई जहाज से गुजरात आते हैं और खादी की बात करते हैं। साबरमती महात्मा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट बनाकर गांधी के लिए काम करने वाले सभी ट्रस्ट बेकार कर दीये गए हैं। पूर्व उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार पटेल एक सच्चे गांधीवादी थे। सरदार के मोत के समय उनके पास सिर्फ 240 रुपये मिले थे। 

मोदी के गृह मंत्री अमित शाह भी गांधीजी के बारे में बात करते हैं।

अमित शाह की राजनीतिक इच्छा गुजरात का मुख्यमंत्री बनने की है। इसलिए वे गांधीआश्रम आए और चले गए हैं। कांग्रेस के एक दर्जन विधायकों को 16-16 करोड़ रुपये में खरीद के चले गये। गांधी कि बातें और विधेय को की खरीदारी भी की जाती है। गांधी सहयोग में विश्वास करते थे। अब सहकारीता विभाग अमित शाह के हाथ में है। शाह ही गुजरात के सहकारी क्षेत्र में गंदी राजनीति लाई। सहकारी क्षेत्र को अब व्यावसायिक क्षेत्र में बदल दिया गया है। गांधी जी की परछाई सरदार और मोदी की परछाई शाह रहे है। शाह ने चाणक्य, किंगमेकर, मास्टरमाइंड जैसे खिताब अपने नाम किए हैं।

 स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विनायक सावरकर शायद एकमात्र नेता हैं, जिन्हें माफी पत्र लिखकर जेल से रिहा किया गया था। अंग्रेजों की शर्तों को स्वीकार करते हुए, राजनीति में भाग न लेने का वादा करते हुए छोड़ दिया। हालांकि सावकर को 'वीर' मानते है। सावरकर गोडसे के गुरुस्थान में थे। गोजस और सावरकर गांधी की हत्या में शामिल थे।

गोडसेवादी विचारधारा के राजनीतिक प्रतिनिधियों ने गांधीजी को खराब रोशनी में चित्रित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। Wotya App University से ऐसा रोज हो रहा है। गांधी को मारा मगर पाकिस्तान जा के जीन्हा को क्युं नहीं मार डाला? माइकल ओ डायर की 4 जून 1940 को सरदार उधम सिंह ने गोली मारकर हत्या अन के देश जाकर कर दी थी। उसे फांसी पर लटका दिया गया। वह एक देशभक्त थे।

 आचार्य मणिशंकरभाई पीतांबरदास से मिले 2553 रुपये में जमीन का एक टुकड़ा आश्रम के लिये खरीदा गया। मिल मजदूरों ने एक दिन का वेतन देने के बाद यहां आश्रम शुरू किया था और मिल मालिकों ने इतनी ही राशि का भुगतान किया था। अब वहां एक भव्य आश्रम बनाया जा रहा है।

7 साल में अमित शाह की आमदनी में 300 फीसदी की बढ़ोतरी हुंई थी।  दिसंबर - 2012 के दौरान शाह की कुल संपत्ति आठ करोड़ 53 लाख बताई गई। महज पांच साल में शाह की संपत्ति में 300 फीसदी का उछाल देखकर विपक्ष ने इस पर सवाल उठाया।

गांधी ने सत्य की खोज के लिए सार्वजनिक जीवन, सार्वजनिक सेवा या राजनीति को एक दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी के रूप में माना। आदर्शवादी थे विचार थोपे नहीं जाते। वर्तमान राजनेता अपने विचारों को थोप रहे हैं।

गांधी जी का सत्य ही उनका हथियार था। मौजूदा नेता झूठ बोलने में माहिर हैं। उनके पास एक सच्चा परमेश्वर नहीं है। गांधी जी जीवन में कई छवि से नहीं चिपके रहे। लेकिन आज के राजनेता अपने प्रदेश अध्यक्ष के गिरने पर भी उनका सामना करने से बचते हैं। क्योंकि इससे उनकी छवि खराब होती है।

जाति में विश्वास रखने वाले गांधी ने सच्चाई का एहसास होने पर दोनों का त्याग कर दिया। वर्तमान नेताया धर्म की छोटली और जाति की सीढ़ियाँ सिंहासन तक। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना का विरोध करने वाले गांधीजी 1947 में कश्मीर में सेना भेजने के लिए सहमत हुए। उन्होंने सेना के उड़ने वाले विमानों को आशीर्वाद दिया। लेकिन कश्मीर में 370 हटाने के बाद मौजूदा नेता पांडि तो को इंसाफ नहीं दिला सके।

 गांधी लोकतंत्र के ब्रांड एंबेसडर थे। वर्तमान नेता लोकतांत्रिक नहीं बल्कि हिटलर जैसे तानाशाह हैं।

गांधीजी सुपर हीरो थे। वर्तमान नेता विश्व मानव बन ने के लिये प्रचार कर रहे है। गद्दी पाने के लिए गांधी की नकल करते हैं तो भी वे गांधी नहीं बन सकते। चरखा - ब्रह्मचर्य - ग्रामोद्योग - धर्मनिरपेक्षता गांधी के थे। लेकिन मौजूदा नेता सत्ता हासिल करने के लिए इन सब चीजों का इस्तेमाल विपरीत करते हैं। भाजपा की यह विचारधारा एक फीके विचार की तरह है। गांधी जिंदा होते तो बीजेपी का झूठ देख 

मोदी खुद एक ब्रांड बन जाते हैं लेकिन गांधी ब्रांड की ब्रांडिंग करते हैं।

खादी है परंपरा, फैशन! गुजरात में गांधी का आकर्षण है। खादी के नाम पर पांच सितारा गांधी-ग्राम बनाया जाएगा, जहां गांधीवादी जीवन शैली के साथ जीने का नया अनुभव मिलेगा। गांधी वैश्विक पर्यटन के लिए गुजरात के ब्रांड एंबेसडर हैं। गांधी जैसे मेगा ब्रांड से जुड़ने का सम्मान किसी को नहीं मिल सकता। खादी एक पर्यावरण के अनुकूल पोशाक है। कुछ नेता साल में 400 कपडें बनाते है। खादी फैशन शो होते हैं। खादी की बिकिनी बनाकर नेता सत्ता हासिल कर सकते हैं।

मीडिया में व्यापक कवरेज के साथ गांधी जी को याद करना आज फैशन बन गया है।

गांधी गुजरात से आविष्कार को सबसे बड़ा वैश्विक ब्रांड बना रहे हैं- गांधी। क्योंकि गांधी के नाम पर सत्ता कायम रखनी है। गांधीजी में वर्तमान की सच्चाई को स्वीकार करने का साहस था। लेकिन आज के गाडी प्रिय नेता ऐसा नहीं कर सकते। सत्याग्रह शिविर साबरमती नदी के तट पर था। सचिवालय के पास ही गांधीनगर में जन सत्याग्रह कैंप को 5 किमी दूर ले जाकर गांधी का अनुयायी नहीं बनाया जा सकता. गांधी जी कह ते  थे, 'मेरा जीवन मेरा संदेश है'। आज के राजनेता ऐसा शब्द नहीं कह सकते। गांधीजी द्वारा लिखित और उनके द्वारा प्राप्त 35 हजप पत्र हैं। लेकिन गुजरात की महिलाओं द्वारा लिखे गए पत्रों का जवाब दिल्ली से भी नहीं मिलता। गांधीजी का व्यवहार हिंदू और मुस्लिम समानता, सभी धर्मों की समानता के सिद्धांत पर आधारित है, और सांप्रदायिक हिंसा से बचने के लिए यथासंभव योगदान दिया। लेकिन 2002 में सत्ता पाने के लिए गुजरात में पहले कभी दंगे नहीं  हुए ऐसा हुंआ था।

हिंदू महासभा के नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को गोली मारी। यहां हर रोज गांधी को गोली मारी जाती है। गांधी कहते थे, मेरे पास दुनिया को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। आज के नेता खुद को विश्व नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। सत्य और अहिंसा उतनी ही पुरानी हैं जितनी कि पहाड़ियाँ। लेकिन आज चारों तरफ झूठ का बोलबाला है। गांधी आश्रम में सभी को सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अस्वद, अपरिग्रह जैसे ग्यारह व्रतों का पालन करना आवश्यक था। आज इन सभी मन्नतों को नये आश्रम में धूप में रखा गया है। गांधी और खादी अब कुर्सी पाने का जरिया बन गए हैं।